जब सृष्टि अपने ज्ञात ताप और धर्म के बंधनों से मुक्त हो गई, और ब्रह्मा की अप्रकट जन्म वाली रात्रि बीत चुकी थी, तब त्रिलोक के सभी जीव वहाँ प्रविष्ट हो चुके थे। उस समय, जब पृथ्वी पर घनघोर वर्षा से जल फैल गया, अथवा जब समुद्र शून्य और निर्जन हो गए, तो जल—जिन्हें ‘जल’ कहा जाता है—चारों ओर बहने लगे और पर्वत भी उसी में समा गए। फिर समुद्र ने समूची पृथ्वी को ढँक लिया और उसका अस्तित्व प्रकट हुआ। इन सब तत्वों के एकत्र होने पर, उन्हें महीनों और प्रकाशों के रूप में अनुभव किया जाता है। तत्पश्चात तत्व फैलने लगे, और उन्हीं से सूक्ष्म तत्त्वों का स्मरण हुआ। उस एकमात्र समुद्र में जल विद्यमान था; वे नष्ट नहीं हुए, और उसी प्रकार, जितनी देर तक वह ब्रह्मा की रात्रि रही, सब लोग जलरूप में ही स्थिर रहे। उस समय वायु शांत थी, चारों ओर अंधकार व्याप्त था, कहीं भी प्रकाश नहीं था। तब ब्रह्मा ने पुनः इस संसार के विभाजन का संकल्प किया। वे सहस्र नेत्रों और सहस्र चरणों वाले ब्रह्मा बने। वही ब्रह्मा, जो नारायण के नाम से प्रसिद्ध हैं, उस समय जल पर शयन कर रहे थे। इस प्रकार प्रथम चरण में प्राचीन कथा का उद्घोष हुआ। यह सब सुनकर कपेय नामक श्रोता हर्षित मन से प्रश्न करने लगे। तब, उस स्थान से, कालचक्र के ज्ञाता ने आगे का क्रम समझाना प्रारंभ किया। उन्होंने कहा, ‘‘मैं इसे भलीभाँति जानना चाहता हूँ, क्योंकि आप निश्चय ही निपुण हैं।’’ तब वे त्रिलोक की सम्पूर्ण उत्पत्ति का वर्णन करने लगे—भूत, भविष्य और उनके बीच के युग-क्रम को भी समझाया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में जो कल्याणकारी कल्प चल रहा है, वह वराह कल्प है। पूर्व और भविष्य के कल्पों के मध्य की स्थितियों को भी समझो। एक और कल्प प्रारंभ होता है, जिसमें जनलोक आदि लोक पुनः प्रकट होते हैं। कल्प के अंत में सभी प्राणी पूर्णतः विनष्ट हो जाते हैं। मन्वंतर के भीतर युगों के संधिकाल बिना विघ्न के चलते रहते हैं। पूर्ववर्ती कल्पों का संक्षिप्त वर्णन भी किया गया। उन्होंने आगे कहा, ‘‘एक कल्प पूर्व भी था, जो महाकल्प के अर्धभाग के पार था। उन कल्पों में से यह वर्तमान कल्प प्रथम है, हे द्विजश्रेष्ठ। यह स्थिरता का काल है; इसके बाद संहार का स्मरण होता है। पूर्वकाल में सहस्र चतुर्युगों के साथ मन्वंतर भी थे। उस समय स्वर्गलोक में निवास करने वाले देवता थे। उन पुण्यात्मा देवताओं की संख्या अठ्ठाईस करोड़ थी। तीन सौ करोड़ और बानवे करोड़ की भी गणना थी। प्रत्येक कल्प में ‘दैव’ नामक देवताओं का स्मरण किया जाता है।’’ ‘‘देवता, पितर, ऋषि और अमरगण, साथ ही जो वर्ण और आश्रम से परे थे—उस समय आकाश में स्थित देवता—सभी महाप्रलय के समीप आने पर समान स्थिति में स्थित हो गए। त्रिलोक में निवास करने वाले, अपने-अपने रूपों में स्थित ये देवता, जो कल्प के अंत तक स्थिर रहते हैं, जब वह प्रलय आया, तो वे विचलित हो गए और उन्होंने अपने मन को महर्लोक की ओर लगा दिया।’’ इस प्रकार, सृष्टि के आरंभ, विस्तार, कल्पों के क्रम और प्रलय के समय देवताओं की गति का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया।