चारोँ युग प्रताप तुम्हारा । है परसिद्ध जगत उजियारा ॥
साधुसंतके तुम रखवारे । असुर निकंदन राम दुलारे ॥
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता । असवर दीन्ह जानकी माता ॥
राम रसायन तुम्हरे पासा । सदा रहो रघुपति के दासा ॥
तुम्हरे भजन राम को पावै । जन्म जन्म के दुख बिसरावै ॥
अंतकाल रघुपति पुर जायी । [** रघुवर **] जहाँ जन्मि हरिभक्त कहायी ॥
और देवता चित्त न धरयी । हनुमत सेयि सर्वसुखकरयी ॥
संकट हरै मिटै सब पीरा । जो सुमिरै हनुमत बलवीरा ॥
जै जै जै हनुमान गोसायी । कृपा करहु गुरु देव की नायी ॥
यह शतवार पाठ कर जोयी । छूटहि बंदि महासुख होयी ॥
जो यह पढै हनुमान चालीसा । होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा । कीजै नाथ हृदय मह डेरा ॥
पवनतनय संकट हरण मंगळ मूरति रूप ॥ राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥