अब मैं आपको कौषीतकि उपनिषद् के इन महान् प्रसंगों को एक सुंदर, प्रवाही कथा के रूप में सुनाता हूँ। सर्वोच्च प्राप्ति की बात आती है, तो शास्त्र कहता है कि जब सभी देवता—वाणी, दृष्टि, श्रवण, मन—इस शरीर से निकल गए, तो शरीर जैसे प्राणहीन हो गया। सबसे पहले वाणी आई, उसने शरीर को बोलने योग्य बनाया, फिर भी जीवन नहीं लौटा। दृष्टि आई, उसने देखने की शक्ति दी, परंतु प्राण नहीं आया। श्रवण आया, तब भी जीवन नहीं लौटा। मन आया, विचार करने की शक्ति मिली, फिर भी शरीर निर्जीव रहा। अंत में जब प्राण आया, तभी वह शरीर सचमुच उठ खड़ा हुआ। तब देवताओं ने विचार किया कि प्राण ही सर्वोच्च है, और वे सब प्राण में एकाकार हो गए। वे प्राण को ज्ञानस्वरूप आत्मा मानकर, वायु में स्थित होकर, आकाश को अपना सार बनाकर, स्वर्ग को प्राप्त हुए। जो मनुष्य इस रहस्य को जानता है, वह भी प्राण में एक होकर, सभी प्राणियों के साथ इस शरीर से जाता है, और वायु को आधार, आकाश को सार मानकर स्वर्ग को प्राप्त करता है। जब देवता उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अतः देवता अमर हैं। अब पिता से पुत्र को ज्ञान सौंपने की परंपरा का वर्णन आता है। पिता अपने पुत्र को बुलाता है, नौ कुश की पत्तियाँ बिछाता है, अग्नि स्थापित करता है, जलपात्र रखता है, पुराने वस्त्र से स्वयं को ढँककर लेट जाता है। पुत्र पास आकर बैठता है। पिता अपने इंद्रियों को पुत्र की इंद्रियों से स्पर्श कर, एक-एक करके कहता है—“मैं वाणी तुझमें स्थापित करता हूँ।” पुत्र उत्तर देता है—“पिता, वाणी मुझमें स्थापित करें।” इसी प्रकार प्राण, दृष्टि, श्रवण, मन, अन्न का सार, कर्म, सुख-दुःख, आनंद, संतान, गमन, बुद्धि, विवेक और इच्छाएँ—इन सबका स्थानांतरण पिता पुत्र में करता है। फिर पिता पुत्र को आशीर्वाद देता है—“तुम्हें यश, तेज, पोषण और कीर्ति प्राप्त हो।” पुत्र अपने दाएँ जंघा को हाथ या वस्त्र से ढँककर प्रार्थना करता है—“तुम स्वर्गलोक और इच्छित फल प्राप्त करो।” यदि पिता स्वस्थ है, तो पुत्र की समृद्धि के साथ रहता है या चला जाता है; यदि पुत्र ही चला जाए, तो पिता अनुष्ठान पूर्ण करता है। इसके बाद प्रतर्दन, दिवोदास का पुत्र, इन्द्र के प्रिय स्थान पर पहुँचा। युद्ध और पराक्रम से प्रसन्न होकर इन्द्र ने कहा—“प्रतर्दन, वर माँग।” प्रतर्दन ने उत्तर दिया—“आप जो मनुष्य के लिए श्रेष्ठ समझें, वही दें।” इन्द्र बोले—“दूसरे के लिए वर नहीं चुना जाता, स्वयं चुनो।” प्रतर्दन ने कहा—“तो मुझे अमरता दें।” इन्द्र ने कहा—“मुझे जानो; यही मनुष्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है। मैंने त्रिशीर्षा त्वष्टृ दैत्य को शालावृकों के पास भेजा, स्वर्ग में प्रह्लादियों को, वायुमंडल में पौलोमों को, पृथ्वी पर कालखञ्जों को जीता; फिर भी मेरा एक भी बाल नहीं टेढ़ा हुआ। जो मुझे जानता है, कोई पाप, कोई कर्म उसे नष्ट नहीं कर सकता—माँ-पिता की हत्या, चोरी, गर्भपात—कोई पाप उसे स्पर्श नहीं करता।” इन्द्र ने आगे कहा—“मैं ही प्राण हूँ, मैं ही ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ। मुझे जीवन और अमरता के रूप में पूजो। जीवन ही प्राण है, प्राण ही अमरता है। जब तक प्राण शरीर में है, जीवन है; प्राण के द्वारा ही परलोक में अमरता प्राप्त होती है। जो मुझे जीवन और अमरता के रूप में पूजता है, उसे इस लोक का सम्पूर्ण जीवन, स्वर्गलोक की अमरता और स्थिरता प्राप्त होती है। कुछ लोग कहते हैं कि प्राण अलग-अलग चले जाते हैं, परंतु कोई भी वाणी से सब नाम, दृष्टि से सब रूप, श्रवण से सब शब्द, मन से सब विचार एक साथ नहीं जान सकता। प्राण सबमें एक है; वाणी बोलती है, तो सब प्राण बोलते हैं; दृष्टि देखती है, तो सब प्राण देखते हैं; श्रवण सुनता है, तो सब प्राण सुनते हैं; मन सोचता है, तो सब प्राण सोचते हैं; प्राण श्वास लेता है, तो सब प्राण श्वास लेते हैं। यह है प्राणों की सर्वोच्च प्राप्ति।” फिर शास्त्र कहता है—वाणी चली जाए, तो भी मनुष्य जीवित रहता है—मूक को देखो। दृष्टि चली जाए, तो भी जीवन रहता है—अंधे को देखो। श्रवण चला जाए, तो भी जीवन रहता है—बहरों को देखो। मन चला जाए, तो भी जीवन रहता है—बुद्धिहीन को देखो। हाथ-पैर कट जाएँ, फिर भी जीवन रहता है। लेकिन केवल प्राण ही है जो इस शरीर को धारण करता है। अतः केवल प्राण का ही उपासना करनी चाहिए। प्राण ही ज्ञान है, ज्ञान ही प्राण है। दोनों साथ रहते हैं, साथ ही जाते हैं। यही दृष्टि, यही ज्ञान है। जब मनुष्य सोता है और स्वप्न नहीं देखता, तब उसमें केवल प्राण ही एकीकृत रहता है। वाणी उसमें सब नामों के साथ, दृष्टि सब रूपों के साथ, श्रवण सब शब्दों के साथ, मन सब विचारों के साथ उसमें समाहित हो जाते हैं। जब वह जागता है, तो जैसे अग्नि से चिंगारियाँ चारों ओर फैलती हैं, वैसे ही प्राण अपने-अपने स्थानों पर चले जाते हैं। मृत्यु के समय भी यही होता है—सब इंद्रियाँ लुप्त हो जाती हैं, केवल प्राण शेष रहता है। जब वह शरीर छोड़ता है, तो वाणी से सब नामों को, प्राण से सब गंधों को, दृष्टि से सब रूपों को, श्रवण से सब शब्दों को, मन से सब विचारों को प्राप्त करता है। सबकी प्राप्ति प्राण में ही है। प्राण और ज्ञान साथ रहते हैं, साथ ही जाते हैं। अब सब प्राणी कैसे ज्ञान में एक हो जाते हैं, यह बताया जाता है। वाणी, नाक, नेत्र, कान, जिह्वा, हाथ, शरीर, जननेन्द्रिय, पैर—ये सब ज्ञान के एक-एक अंग हैं, और इनके विषय—नाम, गंध, रूप, शब्द, अन्न का सार, कर्म, सुख-दुःख, आनंद-संतान, गमन—ये सब तत्व ज्ञान के पार स्थित हैं। बुद्धि स्वयं ज्ञान का अंग है, और उसकी विवेक-इच्छाएँ भी तत्व हैं। ज्ञान के द्वारा ही वाणी से नाम, प्राण से गंध, दृष्टि से रूप, श्रवण से शब्द, जिह्वा से अन्न का सार, हाथों से कर्म, शरीर से सुख-दुःख, जननेन्द्रिय से आनंद-संतान, पैरों से गमन, और बुद्धि से विवेक-इच्छाएँ प्राप्त होती हैं। बिना ज्ञान के कोई भी इंद्रिय, कोई भी विषय प्रकट नहीं कर सकती—यह मन के बिना असंभव है। बिना ज्ञान के वाणी नाम नहीं जानती, प्राण गंध नहीं जानता, दृष्टि रूप नहीं जानती, श्रवण शब्द नहीं जानता, जिह्वा अन्न का सार नहीं जानती, हाथ कर्म नहीं जानते, शरीर सुख-दुःख नहीं जानता, जननेन्द्रिय आनंद-संतान नहीं जानती, पैर गमन नहीं जानते, बुद्धि विवेक-इच्छाएँ नहीं जानती। अतः, जानना चाहिए—वाणी को जानने का प्रयत्न न करो, बल्कि वक्ता को जानो; गंध को नहीं, सूँघने वाले को जानो; रूप को नहीं, देखने वाले को जानो; शब्द को नहीं, सुनने वाले को जानो; अन्न के सार को नहीं, जानने वाले को जानो; कर्म को नहीं, कर्ता को जानो; सुख-दुःख को नहीं, जानने वाले को जानो; आनंद-संतान को नहीं, जानने वाले को जानो; गमन को नहीं, जानने वाले को जानो; मन को नहीं, विचारक को जानो। ये दस तत्व ज्ञान से नियंत्रित हैं, और ज्ञान तत्वों से। दोनों के बिना कोई रूप उत्पन्न नहीं होता। जैसे चक्र की तिरछी पर तीलियां, और तीलियों पर धुरी स्थित होती है, वैसे तत्व ज्ञान पर, और ज्ञान प्राण पर स्थित है। यही प्राण ज्ञानस्वरूप, आनंदमय, अजर, अमर है। अच्छे कर्म से बढ़ता नहीं, बुरे कर्म से घटता नहीं। वही शुभ कर्म कराता है, वही अशुभ भी; वही संसार का स्वामी, रक्षक, नियंता है। जानो—“यह मेरा आत्मा है।” अब कथा आती है गार्ग्य बालाकिर्य की, जो विद्या की खोज में उशीनर, मत्स्य, कुरु, पांचाल, काशी, विदेह में रहा। वह काशी के राजा अजातशत्रु के पास गया और बोला—“मैं आपको ब्रह्म का ज्ञान दूँगा।” राजा ने उसे हजार मुद्राएँ दीं। बालाकिर्य ने सूर्य के पुरुष की उपासना बताई, पर अजातशत्रु ने कहा—“ऐसे नहीं, वह सब प्राणियों के सिर पर उज्ज्वल वस्त्रधारी है, उसकी ऐसे उपासना करो, तब सबका सिर बनोगे।” इसी प्रकार चंद्रमा, विद्युत, मेघगर्जन, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण, प्रतिध्वनि, शरीर की छाया, स्वप्न देखने वाला, दाएँ-बाएँ नेत्र—इन सबकी उपासना के भेद राजा ने बताए और कहा कि इन सबका उपासक उनके विशेष फल को प्राप्त होता है, परंतु यह ब्रह्म का पूर्ण ज्ञान नहीं है। जब बालाकिर्य मौन हो गया, तब अजातशत्रु ने कहा—“क्या बस इतना ही?” बालाकिर्य ने स्वीकार किया। तब राजा ने कहा—“तुमने व्यर्थ उपासना की; अब मैं तुम्हें ब्रह्म बताऊँगा।” फिर उसने बालाकिर्य का हाथ पकड़ा और एक सोते हुए मनुष्य के पास गया। राजा ने पुकारा, पर वह नहीं जागा; तब राजा ने उसे छड़ी से मारा, वह जाग गया। राजा ने पूछा—“यह पुरुष कहाँ गया था, कहाँ से लौटा?” बालाकिर्य न जान सका। तब अजातशत्रु ने बताया—हृदय की नाड़ियाँ, जो बहुत सूक्ष्म हैं, उनमें यह पुरुष रहता है। जब मनुष्य गहन निद्रा में होता है, स्वप्न नहीं देखता, तब वह केवल प्राण में लीन रहता है। वाणी, दृष्टि, श्रवण, मन—सब उसमें समाहित हो जाते हैं। जागते ही जैसे अग्नि से चिंगारियाँ निकलती हैं, वैसे ही प्राण अपने-अपने स्थानों को चले जाते हैं। जैसे उस्तरा म्यान में, मकड़ी जाले में छिपी रहती है, वैसे ही यह बुद्धिमान आत्मा शरीर में बालों से नाखून तक व्याप्त है। जो इस आत्मा को जानता है, वह स्वामी की भाँति अपने लोगों के बीच सुख से रहता है, और वे उसके साथ। जैसे इन्द्र ने जब तक आत्मा को नहीं जाना, असुरों से पराजित होता रहा; जब जान लिया, तो असुरों को जीतकर देवताओं का स्वामी बन गया। वैसे ही जो मनुष्य इस आत्मा को जानता है, वह सब बुराइयों को जीतकर सब प्राणियों का स्वामी, अधिपति और शासक बन जाता है। ऐसा है यह अद्भुत ज्ञान, जो प्राचीन ऋषियों ने हमें सौंपा है।